जोशीमठ : गौरा देवी की छतोली आज फ्यूंला नारायण पहुंचेगी

Team PahadRaftar

सदियों पुरानी परंपरा के तहत देवग्राम से कैलाश के लिए रवाना होगी छतोली, 14 सितंबर को रोखनी बुग्याल में होगी जात

संजय कुंवर चमोली। उत्तराखंड में इन दिनों नंदा देवी की जात यात्राओं की धूम है। इसी बीच कल्प क्षेत्र की उर्गम-भरकी घाटी में भगवती गौरा देवी की पारंपरिक छंतोली यात्रा भी रविवार को धार्मिक उल्लास के साथ शुरू होगी। देवग्राम स्थित गौरा देवी मंदिर में छंतोली पूजन के बाद भगवती की छतोली कैलाश के लिए रवाना होगी। यह परंपरा क्षेत्र में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है।

परंपरा के अनुसार देवग्राम के भल्ला परिवार के लोग भगवती के लिए ककड़ी, च्यूड़ा, ब्यूंला, 12 प्रकार के चावल, ढाका की मलमल, माथे की बिंदी, सांकुरी, रेशमी साड़ी, मावा की रसद, चीणा-कौणी का च्यूड़ा और बासी लावण सहित अन्य सामग्री लेकर यात्रा में शामिल होंगे।

देवग्राम से रवाना होने के बाद भगवती की छतोली रांता, कल्पेश्वर, जब्बर खेत विनायक, दुदला पाटी विनायक, खरसू पाटी विनायक, कुंडी विनायक और खौड़ विनायक होते हुए फ्यूंला नारायण धाम पहुंचेगी। प्रतिवर्ष नंदा अष्टमी की द्वितीया तिथि को भगवती को बुलावा कैलाश भेजने और कैलाश से भगवती को मायके बुलाने की मान्यता के तहत यह यात्रा आयोजित होती है।

फ्यूंला नारायण में होगा भव्य स्वागत

फ्यूंला नारायण धाम में इस वर्ष मंदिर के पुजारी आशीष पंवार, महिला पुजारी आनंदी देवी और अन्य गणमान्य लोगों की ओर से जात यात्रियों का स्वागत किया जाएगा। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।

14 सितंबर को छतोली पहुंचेगी रोखनी बुग्याल

अगले दिन भगवती की छतोली रोखनी बुग्याल की ओर प्रस्थान करेगी। मौलगड़ा बुग्याल और मल्यूं बुग्याल होते हुए यात्रा रोखनी बुग्याल पहुंचेगी। यहां क्षेत्रपाल देवता की अगवानी के बाद जात की परंपरा पूरी की जाएगी।

रोखनी बुग्याल में होती है ब्रह्मकमल पूजा

रोखनी बुग्याल में जात की विशेष धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। मायके पक्ष की ओर से भगवती को अर्पित प्रसाद को ऊन से बने वस्त्र में रखा जाता है। इसके साथ जात यात्रियों द्वारा लाए गए भगवती के निशानों को भी वहां रखा जाता है।

इसके बाद सीमित समय में ब्रह्मकमल संग्रह की परंपरा निभाई जाती है। जात यात्रियों के अनुसार इस दौरान विशेष सावधानी और अनुशासन रखा जाता है। ब्रह्मकमल की पूजा के बाद इसे भगवती को मायके पक्ष के साथ उनके मैती मुल्क में आने का प्रतीक माना जाता है।

दोपहर बाद जात यात्री छतोली के साथ फ्यूंला नारायण धाम लौटते हैं। यहां ब्रह्मकमल से भगवान नारायण, भगवती नंदा-सुनंदा, जाख देवता और पितृगणों की पूजा-अर्चना की जाती है।

कल्पेश्वर में होता है शिव-पार्वती मिलन

फ्यूंला नारायण से लौटने के दौरान विभिन्न देव स्थलों पर ब्रह्मकमल अर्पित किया जाता है। यात्रा के दौरान कल्पेश्वर महादेव में शिव-पार्वती के मिलन की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद जात यात्रा देवग्राम स्थित गौरा देवी मंदिर पहुंचती है।

देवग्राम में ग्रामीण एकत्र होकर भगवती का भव्य स्वागत करते हैं। मंदिर में गौरा देवी की मूर्ति को ब्रह्मकमल से विशेष रूप से सजाया जाता है, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘फूल कौठा’ कहा जाता है। पुजारी द्वारा भगवती को ब्रह्मकमल से सजाने के बाद भोग लगाया जाता है और आरती की जाती है। इसके साथ ही प्रसाद ग्रहण के बाद पारंपरिक जात यात्रा का समापन होता है।

 

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