
केदार घाटी में मौसम की बेरुखी और वन्यजीवों का आतंक, काश्तकारों पर दोहरी मार
लक्ष्मण नेगी
उखीमठ। केदार घाटी में मौसम का मिजाज बदलने से काश्तकारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कभी बारिश और ठंड तो कभी तापमान में उतार-चढ़ाव से खेतों में तैयार हो रही फसलों पर संकट गहराने लगा है। वहीं, जंगली जानवरों का आतंक पहले से ही किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहा है। ऐसे में काश्तकारों को मौसम और वन्यजीवों की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।
घाटी के विभिन्न गांवों में इन दिनों कई प्रजाति की फसलें तैयार होने के दौर में हैं। महीनों की मेहनत के बाद तैयार हो रही फसलों पर मौसम के लगातार बदलते मिजाज का असर पड़ने की आशंका है। बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित होने की चिंता काश्तकारों को सताने लगी है।
मदमहेश्वर घाटी के गैड़ बष्टी निवासी प्रगतिशील काश्तकार बलवीर राणा ने बताया कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। बीज, खाद, जुताई और मजदूरी पर अधिक खर्च हो रहा है। इसके बाद जंगली जानवर खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। बंदर, सूअर और साही समेत अन्य वन्यजीवों से फसल बचाने के लिए ग्रामीणों को दिन-रात खेतों की रखवाली करनी पड़ रही है।
उन्होंने कहा कि मौसम की अनिश्चितता और वन्यजीवों के बढ़ते आतंक से पारंपरिक खेती गंभीर संकट में है। खेतों में खड़ी फसलों की सुरक्षा के लिए रात में पहरा देने से ग्रामीणों की दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है। इससे खेती से लोगों का मोहभंग होने की स्थिति बन रही है।
प्रधान उनियाणा बिशाम्बरी देवी और प्रधान बुरूवा मदन भट्ट ने शासन-प्रशासन से मौसम से प्रभावित फसलों का स्थलीय निरीक्षण कर क्षति का आकलन कराने की मांग की है। उन्होंने जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए ठोस कार्ययोजना बनाने पर भी जोर दिया।
फसल सुरक्षा के लिए ठोस कदम जरूरी
प्रधान मनसूना मिथला देवी और पूर्व प्रधान प्रेमलता पंत ने कहा कि पहाड़ों में खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवनशैली का महत्वपूर्ण आधार है। मौसम और वन्यजीवों से होने वाले नुकसान के चलते काश्तकारों को राहत देने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने फसल क्षति का सर्वे कर मुआवजा देने, वन्यजीवों के आतंक से निजात दिलाने और मौसम आधारित कृषि सलाह गांवों तक पहुंचाने की मांग की है।
