रूद्रप्रयाग : भरत चौधरी ग्राम प्रधान से कैबिनेट मंत्री तक : संघर्ष, सियासत और सफलता की कहानी

Team PahadRaftar

भरत चौधरी ग्राम प्रधान से कैबिनेट मंत्री तक : संघर्ष, सियासत और सफलता की कहानी

लक्ष्मण नेगी 

रूद्रप्रयाग के विधायक भरत सिंह चौधरी का राजनीतिक सफर पहाड़ की कठिन चढ़ाइयों जैसा रहा है—जहां ठहराव कम और संघर्ष अधिक दिखता है। ग्राम प्रधान से शुरुआत कर कैबिनेट मंत्री तक पहुंचना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और लगातार प्रयासों की मिसाल है।

शुरुआती दौर : गांव की राजनीति से बड़ी पारी

रूद्रप्रयाग जनपद के क्वांरी-चमकोट मूल निवासी भरत चौधरी ने घोलतीर-नगरासू में बसने के बाद 80 के दशक में मवाणा ग्राम प्रधान बनकर अपने सियासी सफर की नींव रखी। इसके बाद उन्होंने कर्णप्रयाग ब्लॉक प्रमुख पद के लिए दावेदारी की, जहां उन्हें तत्कालीन सांसद चंद्रमोहन सिंह नेगी का समर्थन मिला। हालांकि, इस चुनाव में उन्हें अनसूया प्रसाद मैखुरी से हार का सामना करना पड़ा।

हार का सिलसिला, लेकिन हौसला कायम

सियासत में उनकी राह आसान नहीं रही। 1989 में जनता दल के टिकट पर कर्णप्रयाग से विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत नहीं मिली। 2002 में राज्य गठन के बाद टिकट की राजनीति में भी उतार-चढ़ाव आए—कांग्रेस में टिकट कटना और फिर वापस मिलना, लेकिन नतीजा फिर हार।

लगातार पांच विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद भरत चौधरी ने हार नहीं मानी। यही जिद उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बन गई।

भाजपा से जुड़ाव और सफलता की शुरुआत

2015 में उन्होंने भुवन चंद्र खंडूरी के साथ जुड़कर भाजपा का दामन थामा। इसके बाद 2017 में भाजपा ने उन्हें रूद्रप्रयाग से टिकट दिया और उन्होंने पहली बार विधानसभा का चुनाव जीतकर इतिहास बदल दिया।

2022 में लगातार दूसरी जीत के साथ उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया

मंत्री पद तक का सफर

शुक्रवार को हुए मंत्रीमंडल विस्तार में पुष्कर सिंह धामी की सरकार में भरत सिंह चौधरी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया। यह उनके लंबे संघर्ष और राजनीतिक धैर्य का परिणाम माना जा रहा है।

परिवार और सियासी प्रभाव

उनकी पत्नी भुवना चौधरी भी जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं, जिससे उनके परिवार की राजनीतिक सक्रियता भी स्पष्ट होती है। चमोली और रूद्रप्रयाग दोनों जिलों में उनका प्रभाव माना जाता है, खासकर चमोली में उनकी पहचान लंबे समय से मजबूत रही है।

सैन्य पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व

भरत चौधरी के पिता छौंदाण सिंह सेना में सूबेदार रहे, जिसका असर उनके अनुशासित और दृढ़ व्यक्तित्व में साफ दिखाई देता है। तार्किक सोच और अपने समर्थकों के साथ मजबूत जुड़ाव उनकी राजनीति की खास पहचान रही है।

मंत्रीमंडल विस्तार: गढ़वाल का दबदबा

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाले 12 सदस्यीय मंत्रीमंडल में गढ़वाल क्षेत्र का वर्चस्व साफ दिख रहा है।

कुल 12 मंत्रियों में से 8 गढ़वाल से

कुमाऊं से केवल 4 मंत्री

नए मंत्रियों में भी गढ़वाल का पलड़ा भारी

गढ़वाल से पहले से मौजूद प्रमुख चेहरों में सतपाल महाराज, धन सिंह रावत, गणेश जोशी और सुबोध उनियाल शामिल हैं।

नए विस्तार में भरत सिंह चौधरी के साथ मदन कौशिक, खजान दास और प्रदीप बत्रा को भी जगह मिली है, जबकि कुमाऊं से केवल राम सिंह कैड़ा को शामिल किया गया।

सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन

मंत्रीमंडल में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश भी दिखती है

ब्राह्मण: 4

ठाकुर: 5

दलित: 2

पंजाबी समुदाय: 1

मैदान और पहाड़ के बीच भी संतुलन साधते हुए 5 मंत्री मैदान से और 7 पहाड़ी क्षेत्रों से लिए गए हैं।

भरत सिंह चौधरी का सफर यह साबित करता है कि राजनीति में निरंतरता और धैर्य अंतत : सफलता दिलाते हैं। पांच बार की हार के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और आज कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली है।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि वह मंत्री के रूप में अपने अनुभव और जमीनी पकड़ का इस्तेमाल करते हुए 2027 के राजनीतिक समीकरणों में भाजपा के लिए कितने प्रभावी साबित होते हैं।

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