उर्गमघाटी : कल्पेश्वर मंदिर में पिता – पुत्र कार्तिकेय का हुआ भावुक मिलन

Team PahadRaftar

माता पिता से मिलने पंचम केदार कल्पेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे कार्तिकेय स्वामी

रघुबीर नेगी

रूद्रप्रयाग जनपद के कनकचौरी से तीन किमी ऊपर क्रोंच पर्वत पर तपस्यारत भगवान शंकर माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय स्वामी युगों बाद भगवान कल्पेश्वर मंदिर पहुंचे जहां श्री कल्पनाथ मंदिर प्रबंधन कार्यकारिणी समिति देवग्राम द्वारा भव्य स्वागत किया गय। गोपेश्वर पीपलकोटी हेलंग होते हुए श्री कार्तिक स्वामी माता पिता से मिलने शाम 6 बजे पहुंचे। दो घंटे तक माता-पिता के सानिध्य में कार्तिक स्वामी को भोग लगाया गया। एक लम्बे युग के बाद माता पिता की कुशलक्षेम पूछी।

गणेश जी का पहले विवाह एवं प्रथम पूजन का अधिकार मिलने से नाराज होकर कैलाश छोड़कर क्रोंच पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे। कार्तिक स्वामी देवताओं के सेनापति भी हैं ,जिन्होंने तारकासुर जैसे शक्तिशाली दैत्य का वध किया जिसे कोई मार नही सकता था।

तारकासुर ने ब्रह्म देव से वरदान मांगा था कि मेरा वध हो तो केवल शिव के पुत्र से क्योंकि तारकासुर जानता था कि शिव तो विवाह करेंगे नहीं भगवान शंकर सती के दक्ष प्रजापति के हवन में आत्मदाह करने से दुःखी होकर कैलाश छोड़कर गुफाओं में तप करने चले गये थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक स्वामी का पालन पोषण 6 कृतिकाओं ने किया जिस कारण शिव के जैष्ठ पुत्र का नाम कार्तिकेय पड़ा।

कामदेव पत्नी देवी रति के श्राप के कारण माता पार्वती गर्भ धारण नहीं कर सकती थी। जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया तो देवताओं ने कार्तिक स्वामी को देवताओं का सेनापति बना दिया। भगवान शंकर ने एक दोनों पुत्रों का विवाह करने की सोची और कहां कि जो ब्रह्मांड की पहले परिक्रमा करके आइये वो प्रथम पूजन का अधिकार उसको होगा।

कार्तिक स्वामी अपने मयूर वाहन में ब्रह्मांड की परिक्रमा करने निकल गये और गणेश जी ने भगवान शंकर और माता पार्वती की सात परिक्रमा कर दी। जिससे गणेश प्रथम पूजन के अधिकारी कहलाये और रिद्धि-सिद्धि के साथ विवाह संपन्न हुआ। जब कार्तिकेय महाराज लौटकर आये तो उन्होंने देखा कि गणेश को प्रथम पूजन का दर्जा मिलकर विवाह हो गया तो वे नाराज होकर अपना मांस माता को सौंपकर अपनी हड्डियां लेकर क्रोंच पर्वत पर तपस्या करने चले गये।

कार्तिक स्वामी मंदिर में लिंग रूप में कार्तिक कुमार की हड्डियों की पूजा होती है 

मान्यता है कि क्रोधित होने के बाद वो दक्षिण भारत में शिवगिरी पर्वत पर चले गये जहां मुरूगन स्वामी के नाम से पूजे जाते हैं। 365 गांवों के आराध्य इन दिनों पंचकेदार पंच प्रयाग बदरीनाथ की यात्रा पर। जिसके तहत पंचम केदार कल्पेश्वर महादेव पहुंचे थे। भावुक माहौल में समझा बुझाकर भोग प्रसाद ग्रहण करने के बाद नृसिंह मंदिर रात्रि विश्राम कर बदरीनाथ भगवान नारायण से भेंट करने पहुंचे । इस अवसर पर पंचम मुख्य पुजारी दर्वान सिंह नेगी, हरि सिंह , कुलदीप सिंह, दिनेश, प्रकाश, राजेन्द्र नेगी, ज्योति, सोनी, विजया, भारती, शरादी देवी लक्ष्मण यादवेन्द्र समेत सैकड़ों भक्त उपस्थिति थे।

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