ऊखीमठ : मद्महेश्वर धारे का पानी बरसात में विलुप्त होने से हर कोई अचंभित

Team PahadRaftar

लक्ष्मण नेगी 

ऊखीमठ : ओंकारेश्वर मन्दिर- मंगोलचारी पैदल मार्ग पर प्रेमनगर तोक में मदमहेश्वर धारे ( प्राकृतिक जल स्रोत ) के नाम से विख्यात जल स्रोत पर विगत तीन – चार वर्षों से बरसात के समय पानी विलुप्त होने से पर्यावरणविद खासे चिन्तित हैं। कोई इसे धार्मिक परम्पराओं से छेड़खानी मान रहा है तो कोई इसे भूगर्भीय हल – हल। ग्रीष्मकाल में जल स्रोत का पानी कैसे प्रकट होता यह गम्भीर व शोध का विषय बना हुआ है। स्थानीय आस्थावनों का कहना है कि बरसात के समय जहां हर प्राकृतिक जल स्रोत रिचार्ज हो जाता है वहीं मदमहेश्वर धारे का पानी अपने आप विलुप्त होना धार्मिक परम्पराओं के साथ खिलवाड़ होने के कारण जल स्रोत का पानी विलुप्त हो रहा है। इस समय पर भू-वैज्ञानिकों ने जल स्रोत के भूगर्भीय सर्वेक्षण के बाद स्पष्ट कारण बताने की बात कही है।

लोक मान्यताओं के अनुसार युगों पूर्व जब भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह उत्सव डोली शीतकालीन प्रवास के बाद ऊखीमठ से कैलाश के लिए रवाना हो रही थी तो प्रेमनगर के ग्रामीणों ने भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह उत्सव डोली से पानी की गुहार लगाई थी। ग्रामीण की गुहार पर भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह उत्सव डोली ने अपने छत्र से खेत की दीवाल पर जल धारा को प्रकट किया था। युगों तक ग्रामीण व आस्थावान इस जल धारे का प्रयोग धार्मिक अनुष्ठान या फिर पीने के लिए करते थे। 13 सितम्बर 2012 की चुन्नी मंगोली आपदा से जहां क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ वही प्राकृतिक जल स्रोत के सुरक्षित रहने से ग्रामीणों की भगवान मदमहेश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा बनी रही। कुछ वर्षों बाद प्राकृतिक जल स्रोत का पानी अचानक सूखने से आस्थावानों की अगाध श्रद्धा को गहरा धक्का लगा। समय गुजरने के बाद पूजा – अर्चना करने से जल स्रोत का जल स्तर फिर रिचार्ज तो हुआ मगर विगत तीन वर्षों से बरसात के समय जल स्रोत के सूखने से पर्यावरणविद के साथ ग्रामीण खासे चिन्तित है। ग्रामीण का कहना है कि धार्मिक परम्पराओं से छेड़खानी होने के कारण बरसात के समय मे मदमहेश्वर धारे का पानी विलुप्त हो रहा है । नगर पंचायत अध्यक्ष कुब्जा धर्म्वाण का कहना है कि भूगर्भीय हल – चल प्राकृतिक जल स्रोत के सूखने का मुख्य कारण हो सकता है , मगर धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं को जीवित रखना भी हमारा नैतिक दायित्व है। पूर्व प्रधान राय सिंह धर्म्वाण का कहना है कि भूगर्भीय हलचल के कारण पानी विलुप्त हो सकता है मगर देवताओं के नाम से प्रसिद्ध जल स्रोत का सूखना भविष्य के लिए शुभ संकेत नही है। गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर पृथ्वी विज्ञान स्कूल भूगोल विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार का कहना है कि हिमालय अभी युवा अवस्था में होने के कारण धीरे – धीरे बढ रहा है तथा भारतीय प्लेट व यूरोपीय प्लेट के भूगर्भ के अन्दर आपस मे टकराने से निवर्तित गति बढने से हिमालयी भू-भाग संवेदनशील बना हुआ है तथा भू-गर्भ के अन्दर निवर्तित गति होने के कारण हिमालय क्षेत्र मे 2 से 3 तीव्रता वाली गतिविधियां हर रोज होती रहती है। उन्होंने बताया कि एक शोध के अनुसार विगत 40 वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में 50 लाख जल स्रोत प्रभावित हुए है । बताया कि विगत 50 वर्षों में बरसात ने अपने प्रवृत्ति बदली है परिणामस्वरूप पूर्व के 365 दिनों में से 125 दिन मेघ बरसते थे तथा वर्तमान समय मे सिर्फ 67 दिन ही मेघ बरस रहे है। बताया कि प्राकृतिक जल स्रोत के उपरी हिस्से मे वृक्षों का अवैध पातन, मोटर मार्ग निर्माण, भवनों का निर्माण जल स्रोत सूखने का मुख्य कारण हो सकता है फिर भी सर्वेक्षण के बाद की पानी विलुप्त होने के कारणो का पता लगाया जा सकता है।

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