
संजय कुंवर
ज्योतिर्मठ : उत्तराखंड की लोक संस्कृति और खुदेड लोकगीतों में रचे बसे एवं बसंत के द्योतक हिलांस, कोकिल, म्योलडी, बसंता कफ्फू पक्षियों की मधुर धुन ने मोहा पक्षी प्रेमियों का मन।
चमोली जिले के सीमांत क्षेत्र ज्योतिर्मठ में मानसून की दस्तक के साथ-साथ इन दिनों बड़ी संख्या में गढ़वाल हिमालय के लोगों की दैनिक जीवन की लोक परंपरा ओर खुदेड गीतों में रचे बसे रंग बिरंगे आकर्षक पक्षियों हिलांस,म्योलडी,ग्रेट बार्बेट,ग्रीन पिजन,कफू, देशी कस्तूरा जैसे ग्रीष्मकालीन आगंतुक पक्षियों ने अपना बसेरा बनाया हुआ है। इस पंछियों का मधुर कोलाहल प्रकृति प्रेमियों और खासकर बर्ड वाचिंग के शौकिनों और सुबह शाम सैर करने वाले के लिए भी आजकल आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दरअसल नन्दा देवी राष्ट्रीय पार्क क्षेत्र के तल्ला खंचा जीरो बैंड,सहित मारवाड़ी, FRH मनोहर बाग, फॉरेस्ट ऑफिस लिंक रोड के आसपास के क्षेत्र में पक्षी अवलोकन करने वाले बर्ड वाचरों को आसानी से ग्रीन पिजन,वैज टेल्ड ग्रीन पिजन, कोकिल पक्षी,हिलांस,म्यूलडी, हिमालयन ग्रेट बार्बिट पक्षी,एशियन कोयल,घुघुति,लेसर कुकू,देशी कस्तूरा,अपनी मधुर गूंज के साथ सुबह शाम जंगलों खेत खलिहानों के साथ साथ फलों के बागानों में खूब नजर आ रहे है।
फूलों की घाटी राष्ट्रीय पार्क की रेंज ऑफिसर ओर बर्ड वाचिंग एक्सपर्ट चेतना काण्डपाल ने भी खुशी जाहिर करते हुए कहा है कि FRH के आसपास उन्हें भी ग्रीन पिजन,कोकिल, सहित कई अन्य प्रजाति के खूबसूरत पक्षियों के दर्शन हुए है। NDBR क्षेत्र में खासकर प्रवासी पक्षियों का डाटा तैयार कर रहे स्थानीय बर्ड वाचिंग एक्सपर्ट संजय कुंवर बताते हैं कि वो ग्रीन पिजन, कोकिल,पक्षी की सुन्दरता और उनके मधुर संगीत से वो काफी प्रभावित हैं। इन दिनों हिलांस म्योलडी पंछी के साथ-साथ थ्रश प्रजाति के मिशेल थ्रश, चितकबरा थ्रश, देशी कस्तूरा, गोल्डन ओरियोल,लेसर कुकू, एशियन कोयल जैसे कई मानसूनी प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में मौजूद हैं जिन्हें पक्षी अवलोकन के दौरान उन्होंने बेहद नजदीक से देखा सुना और महसूस किया है। कोकिल पक्षी तो बड़ी संख्या में इस बार क्षेत्र में नजर आ रहे है। पहाड़ के लोक गीतों में हिलांस पक्षी, म्योलडी,कफू पक्षी का जिक्र आता है लिहाजा जिज्ञासा रहती की इन पक्षियों को आम जीवन में नज़दीक से अवलोकन किया जा सके,पक्षी प्रेमियों के साथ साथ प्रकृति प्रेमियों और विशेष रूप से क्षेत्र की पक्षी जैव विविधता के लिए अच्छी तादात में इन पंछियों का ज्योतिर्मठ क्षेत्र में प्रवास शुभ संकेत है।
दरअसल उत्तराखंड के गढ़ कुमाऊं क्षेत्र की लोक परंपरा और संस्कृति से जुड़े जन कवियों और गीतकारों की मूल रचनाओं में विशेष स्थान पाने वाले ये मानसून सीजन के आवागमन के द्योतक पक्षियों में मुख्य रूप से हिलांस,म्योलडी,कफू,न्योली पक्षी जिसे पहाड़ों में खुदेड़ गीतों का पक्षी माना जाता है जिसकी एक कूक सुनकर जहां सुदूर ससुराल में दैनिक कार्यों में व्यस्त कोई नवविवाहिता अपने मायके की याद ताजा कर देती हैं। बसंत मानसून में जब पहाड़ों में चारों तरफ फूल खिले होते हैं तब हिलांस बांसुरी जैसी अपनी मीठी आवाज से इनमें चार चांद लगाता है। यही वजह है कि पहाड़ों की कोयल कहे जाने वाला हिलांस पहाड़ी गीतकारों की पसंद माने जाते रहे है। आज भी ये पक्षी सीमांत क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए है जिसको देख कर प्रकृति प्रेमियों के साथ साथ पक्षी अवलोकन कर्ताओं ने भी खुशी जाहिर की है।

