
आस्था और रोमांच से भरी है नंदा की नरेला लोकजात
बंड पट्टी में नंदा की वार्षिक लोकजात की तैयारियां शुरू, कुरूड से पहुंचती है नंदा की डोली, नरेला बुग्याल में होती है संपन्न। अपनी ध्याण नंदा को बुलाने कुरूड जायेंगे बंड पट्टी के ग्रामीण बंड पट्टी के एक दर्जन से अधिक गांवों में तैयारी शुरू भव्य होगी नंदा लोकजात।

पीपलकोटी
आखिरकार एक साल के इन्तजार के बाद एक बार फिर बंड पट्टी में नंदा की वार्षिक लोकजात को लेकर तैयारी शुरू हो चुकी है। रविवार को बंड मंदिर समिति की नंदा देवी मंदिर रैतोली में हुई बैठक में नंदा लोकजात को भव्य रूप से मनाने पर सहमति बनी। इस अवसर पर बंड मंदिर समिति के अध्यक्ष जगत सिंह नेगी, महामंत्री रघुनाथ सिंह फर्स्वाण, कोषाध्यक्ष दलबीर राणा, बंड विकास संगठन के अध्यक्ष देवेंद्र नेगी, पूर्व अध्यक्ष शंभू प्रसाद सती, अतुल शाह, अयोध्या हटवाल, सुनील कोठियाल, कुशलानंद, रघुनाथ सिंह चौहान, अनिल चौहान, रणजीत नेगी, राकेश नवानी, भुवन लाल शाह, ताजबर नेगी, राकेश सती, हरेंद्र पंवार सहित अन्य लोग शामिल रहे।
गौरतलब है कि कि नंदा देवी राजजात यात्रा से भी ज्यादा विस्तारित है नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा जो कि नंदा के सिद्धपीठ कुरुड मंदिर से शुरू होती है। यहां से तीन डोलियां हिमालय की ओर प्रस्थान करती है जिसमें राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली बेदनी बुग्याल में और कुरुड दशोली की नंदा डोली बालपाटा बुग्याल और कुरुड नंदा की नंदा डोली नरेला बुग्याल में नंदा सप्तमी के दिन पूजा-अर्चना कर नंदा को समौण भेंट कर लोकजात संपन्न होती है।
ये है बंड कुरूड की की नंदा डोली का कार्यक्रम!
बंड कुरूड की नंदा डोली के अध्यक्ष अशोक गौड़ ने बताया कि बंड कुरूड की की नंदा डोली लोकजात यात्रा 16 अगस्त से शुरू होकर 30 अगस्त को संपन्न होगी।
16 अगस्त–सिद्धपीठ कुरूड से प्रस्थान बिरही कौडिया से होते हुए-रात्रि विश्राम-बाटुला
17 अगस्त–श्रीकोट मायापुर भ्रमण-रात्रि विश्राम-दिगोली
18 अगस्त–दिगोली भ्रमण-रात्रि विश्राम-लुंहा
19 -लुंहा.मेहरागांव क्यूंटा भ्रमण-रात्रि विश्राम-गडोरा.
20 -गडोरा भ्रमण-रात्रि विश्राम-मुल्ला अगथला
21 — मुल्ला अगथला पीपलकोटी भ्रमण-रात्रि विश्राम-नौरख
22– नौरख .मल्ला अगथला भ्रमण तत्पश्चात नंदा देवी (नंदोई) मंदिर मे पूजन कार्यक्रम और रात्रि विश्राम
23– रैतोली में रात्रि विश्राम
24- रैतोली से रात्रि विश्राम कम्यार
25– कम्यार से रात्रि विश्राम किरुली
26 – किरुली. भ्रमण-रात्रि विश्राम-बंड़ भूमियाल कोंटा मंदिर
27– -बंड़ भूमियाल मंदिर से रात्रि विश्राम भनाई (गौणा)
28– भनाई (गौणा) से रात्रि विश्राम गौणा डांडा
29 – गौणा डांडा से पंचगंगा
30 अगस्त — पंचगंगा नरेला बुग्याल
नरेला बुग्याल में नंदा सप्तमी के दिन माँ नंदा की पूजा अर्चना कर मां नंदा को जागरों के द्वारा कैलाश के लिए विदा किया जायेगा जिसके बाद डोली रामणी होते हुए वापस कुरूड मंदिर।
लोक में विख्यात है बंड की नंदा की नरेला बुग्याल की वार्षिक लोकजात यात्रा
वार्षिक लोकजात में कुरूड से चली बंड- नंदा की डोली बंड पट्टी के बिरही, कौडिया, सिरकोट, दिगोली, लुंहा, महरगांव, बाटुला, मायापुर, गडोरा, अगथल्ला, रैतोली, नौरख, पीपलकोटी, सल्ला, कम्यार होते हुये बंड भूमियाल की थाती किरूली गांव पहुंचती है। सैकड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में नंदा के जयकारों और जागरों के साथ बंड भूमियाल का थान थिरक उठता है और चांचणी, झुमेलो की सुमधुर लहरियों से अलौकिक हो उठता है नंदा का लोक। रात भर बंड भूमियाल की थाती में लोकोत्सव का माहौल रहता है। अगले दिन बंड पट्टी के सैकड़ों ग्रामीण माँ नंदा को रोते विलखते विदा करते हैं, साथ ही मां नंदा को समौण के रूप में खाजा, चूडा, बिंदी, चूडी, सहित ककड़ी, मुंगरी भेंट करते हैं। महिलाएँ नंदा के पौराणिक जागर गाकर नंदा को विदा करती हैं। जिसके बाद कुरूड नंदा बंड की डोली सहित अन्य छंतोली किरूली गांव के बंड भूमियाल मंदिर से पंछूला नामक स्थान पर कुणजाख देवता से आज्ञा लेकर विनाकधार, बौंधार, भनाई होते हुये अगले पड़ाव गौणा गाँव के लिए प्रस्थान करती है। गौणा गाँव से अगले दिन छंतोली तडाग ताल, गौणा डांडा, रामणी बुग्याल, चेचनिया विनायक होते हुए रात्रि विश्राम को पंचगंगा पहुंचती है। जिसके बाद अगले दिन डोली पंचगंगा से नरेला बुग्याल पहुंचती है। नरेला बुग्याल में नंदा सप्तमी के दिन मां नंदा की पूजा अर्चना कर, श्रद्धालु अपने साथ लाये नंदा को समौण के रूप में खाजा, चूडा, बिंदी, चूडी, सहित ककड़ी, मुंगरी अर्पित करते हैं। इस दौरान सामने दिखाई दे रहे त्रिशुली और नंदा घुंघुटी पर्वत की पूजा भी करते हैं। और नंदा को कैलाश की ओर विदा कर लोकजात वापसी का रास्ता पकडती है।
12 बरस में आयोजित होने वाली नंदा की बड़ीजात से कई मायनों में ज्यादा विस्तारित है नंदा की वार्षिक लोकजात।
12 बरस में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा और नंदा की वार्षिक लोकजात में शिरकत कर चुके लोकसंस्कृति कर्मी संजय चौहान कहते हैं कि सीमांत जनपद चमोली में प्रत्येक साल भादों के महीने नंदा अष्टमी की यात्रा अर्थात नंदा की वार्षिक लोकजात आयोजित होती है। जनपद के ७ विकासखंडों के ८०० से अधिक गांवों व अलकनंदा, बिरही, कल्प गंगा, मंदाकिनी, पिंडर घाटी की सीमा से लगे गांवों के लोग इस लोकोत्सव में शामिल होते हैं। नंदा की ये वार्षिक लोकजात १२ वर्ष में आयोजित होने वाली नंदा देवी राजजात से कई मायनों में बेहद वृहद और भव्य होती है। लोकजात के दौरान गांवो से लेकर डांडी-कांठी माँ नंदा के जागरों से गुंजयमान हो जाती है। साथ ही दांकुडी, झोडा, चांचरी, की सुमधुर लहरियों से माँ नंदा का मायका अलौकिक हो जाता है। मां नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा नंदा के सिद्धपीठ कुरुड मंदिर से शुरू होती है। यहाँ से प्रस्थान कर राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली बेदनी बुग्याल में और कुरुड दशोली की नंदा डोली बालपाटा बुग्याल और कुरुड बंड की नंदा की छ्न्तोली नरेला बुग्याल में नंदा सप्तमी के दिन पूजा अर्चना कर, नंदा को समौण भेंट कर लोकजात संपन्न होती है।

