नवधान्य ने राज्य स्थापना दिवस पर देहरादूनी बासमती किसानों को किया सम्मानित
देहरादून : नवधान्य जैव विविधता फार्म ने राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर नवधान्य संस्था द्वारा आयोजित देहरादूनी बासमती उत्सव में आज दून घाटी की खुशबू और किसानों की मेहनत दोनों का सम्मान किया गया।

कार्यक्रम में उन किसानों को सम्मान पत्र प्रदान किए गए जिन्होंने अपनी भूमि, परंपरा और बासमती की अनूठी विरासत को सहेजकर रखा है। इस अवसर पर मंच साझा किया नवधान्य की संस्थापक और पर्यावरणविद् डॉ. वंदना शिवा, उत्तराखण्ड जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. एस.पी. सुबुद्धि, भारत जैव विविधता प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष डॉ. बी.बी. माथुर तथा ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानी डॉ. वी.पी. उनियाल ने। डॉ. वंदना शिवा ने कहा कि उत्तराखण्ड की असली पहचान इसकी कृषि संस्कृति और खाद्य जैव विविधता में है।

खासकर महिलाओं ने इस विरासत को बचाने में बड़ा योगदान दिया है। जहाँ देहरादून की भूमि पर कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं, वहीं कुछ किसानों ने अपनी ज़मीन और परंपरा दोनों को जिंदा रखा है। आज हम उन्हीं को सम्मानित कर रहे हैं। डॉ. बी.बी. माथुर ने कहा कि देहरादून का नाम देश के मानचित्र पर लीची और बासमती उत्पादन के लिए खास पहचान रखता है। उन्होंने नवधान्य के बीज संरक्षण और बासमती संरक्षण के प्रयासों को “ऐतिहासिक कार्य” बताया।
उनके शब्दों में जब खेती बचाना खुद एक चुनौती है, तब भी नवधान्य से जुड़े किसान उम्मीद की मिसाल बने हुए हैं।
डॉ. वी.पी. उनियाल ने कहा कि नवधान्य न केवल बीज संरक्षण में कार्य कर रहा है, बल्कि किसान हितैषी कीटों और फसल विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण प्रयास कर रहा है।
उन्होंने बताया कि ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय भी विद्यार्थियों में जैव विविधता संरक्षण की भावना जगाने के लिए विशेष प्रयास कर रहा है।
डॉ. एस.पी. सुब्बुद्धि ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि
आज ज़रूरत है कि युवा पारंपरिक फसलों और स्थानीय उत्पादों पर स्टार्टअप शुरू करें। उत्तराखंड की फसलें, और गैर-कृषि उत्पाद जैसे कनाली, तिमला और गुच्छी मशरूम यदि प्रसंस्कृत रूप में बाज़ार तक पहुंचें, तो यह आजीविका और जैव विविधता दोनों को मज़बूती देंगे।
कार्यक्रम में महिला किसान श्रीमती राजेश्वरी देवी (जगतपुर खादर) ने साझा किया कि उनके गाँव के किसानों ने अब तक अपनी ज़मीन नहीं बेची, बल्कि वे जैविक बासमती की खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। उत्सव में एक किसान ने देहरादूनी बासमती की ऐतिहासिक कहानी सुनाई
कैसे 1839 में अफगान शासक दोस्त मोहम्मद खान, जब अंग्रेजों द्वारा मसूरी भेजे गए थे, तो उन्होंने अपने देश से बासमती के बीज मंगवाकर देहरादून की मिट्टी में बोए थे।
देहरादून की जलवायु ने उन बीजों को ऐसी नई पहचान दी कि वही बन गया आज का देहरादूनी बासमती जिसकी खुशबू अब दुनिया तक पहुंच चुकी है।
कार्यक्रम में किसान, उपभोक्ता, एवं विद्यार्थी (शिवालिक कॉलेज एवं श्रीगुरुराम विश्वविध्यालय) सहित लगभग 200 लोगों ने भाग लिया। किसानों द्वारा तैयार किए गए स्वादिष्ट व्यंजनों — भात, खीर, पुलाव, वेज बिरयानी और डोसा जैसे बासमती आधारित पकवानों ने सबका मन मोह लिया।
कार्यक्रम के अंत में किसानों ने जैव विविधता संरक्षण के प्रति अपने संकल्प को दोहराया कार्यक्रम का संचालन श्रीमती भावना सेमवाल ने किया।
बासमती की महक और चोरी की कहानी
8 जुलाई 1994 को अमेरिका की कंपनी RiceTec Inc. ने दावा किया कि उन्होंने “नई बासमती किस्म” बनाई है — और उस पर उन्होंने पेटेंट भी ले लिया!
यानी भारत को अपने ही बासमती को उगाने और बेचने के लिए उनकी इजाज़त लेनी पड़ती।
यह सुनकर डॉ. वंदना शिवा ने आवाज़ उठाई यह तो हमारे किसानों की मेहनत और हमारी धरोहर की जैव-चोरी (Biopiracy) है!
उन्होंने नवधान्य आंदोलन के साथ इस अन्याय के खिलाफ वैश्विक अभियान छेड़ दिया। जनता की एकजुटता और न्याय की ताकत से 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और अमेरिकी पेटेंट कार्यालय को पुनः जांच के आदेश दिए।
परिणामस्वरूप, 20 में से 15 दावे रद्द हो गए और भारत की जीत हुई। आज जब भी बासमती की खुशबू किसी रसोई से उठती है, तो वह सिर्फ़ खाने की नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपने हक़ और अपने किसान की जीत की महक होती है।
