
एक दिन वो चुपचाप आई,
बरसाती नदी थी, रुक न पाई।
देह की दीवार पर खिंची दिखी,
एक अनकही सी लाल रेखा।
न माँ ने बोला, न बहन ने कहा,
आंखों का दर्द भी कोई न समझा।
हरे दुपट्टे में छुपाने की कोशिश थी,
हर अपना दूर था, हर अपना सहमा।
कपड़े के टुकड़े, राख, और रुमाल
आत्मा की पीड़ा, हृदय भी लाल।
मंदिर के द्वारों से लौट आई वो,
लेकर मन में अनसुलझे सवाल।
क्या अपवित्र है उसका बहना?
या समाज का यूँ मौन सहना?
क्यों अपनों ने तिरस्कृत किया ?
जब प्रकृति ने पुरस्कृत किया ?
न कपड़ा बदला, न साबुन मिला,
मां से भी तो कुछ बोल न पाई।
घर की लक्ष्मी, हफ्ते की कैद में,
ये बंधन कैसा ,जो खोल न पाई।
हर बूँद में जीवन का गीत है,
हर दर्द में सृजन की रीत है।
नस नस को तोड़ती, बेधती,
चट्टान तोड़कर बहता संगीत है।
क्यों न करें अब खुला संवाद?
प्रकृति की क्रीड़ा, गर्व की बात।
क्यों छुपाऊं ,क्यों शर्म से मरूं,
गगन को छू , तू पंछी आजाद।
हर गाँव, गली, हर द्वार द्वार,
न कोई चुप्पी,न शर्म की दीवार।
मासिक धर्म प्रकृति का वरदान,
गर्वित नारीत्व की पहचान।
गंदा कपड़ा, छूआछूत का डर,
सबने कहानियाँ गढ़ दीं झूठी।
नाम दिया जिसे क़ैद कलंक का,
ये प्रकृति की सुनहरी अंगूठी।
चुप मत रहो, अब कहने दो,
यह शर्म नहीं, तेरी पहचान है ।
हर मास बहती जो जीवनधारा,
मानवता का दिव्य अभिमान है।
धरती भी तो लेती हैं साँसें,
फिर ज्यों उगती हरियाली है।
यूँ ही स्त्री का रक्त है बहता ,
फिर जीवन में खुशहाली है।
मत कहो उसे अपवित्र कभी,
वो शक्ति की पवित्र कहानी है।
जिससे शुरू हो जीवन यात्रा,
ये रीत प्रकृति की पुरानी है।
चलो बनें हम साथी उसके,
हर दिन, हर मास, हर बात में।
मासिक धर्म न लाज बने,
शुद्ध आचरण से रहे साथ में।
मासिक धर्म कोई लज्जा नहीं,
ये है जीवन की एक साधना ।
साफ-सफाई, खुलकर चर्चा,
हर बेटी खुश रहे यही है कामना ।
यही है कामना।
आओ समझें, और समझाएं,
स्वच्छता से उसका मान बढ़ाएँ।
तन से ज्यादा मन अशुद्ध है,
आओ मन को पवित्र बनाएं,
मासिक धर्म ईश्वर का उपहार है,
स्वच्छता से ये समय बिताएं,
गंदे कपड़ों का त्याग जरूरी,
सेनेटरी नैपकिन अब अपनाएं
आओ “मासिक धर्म स्वच्छता दिवस” मनाएं।
सत्येन्द्र “बर्त्वाल” की ओर से सभी माता बहनों और बेटियों को समर्पित।

