वीरान से विरासत तक : खलताल में होमस्टे ने जगाई पहाड़ की नई उम्मीद
संजय कुंवर
बदरीनाथ हाईवे से सटे मैठाणा गांव के पास कभी सुनसान पड़ी एक जगह आज पहाड़ी संस्कृति, आत्मनिर्भरता और पर्यटन का जीवंत उदाहरण बन चुकी है। पत्रकार एवं समाजसेवी शशिभूषण मैठाणी ने यहां होमस्टे शुरू कर न केवल एक सफल पहल की, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन पर भी एक सशक्त सवाल खड़ा किया है।

मैठाणा से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर स्थापित खलताल होमस्टे आज हर मौसम में पर्यटकों से गुलजार रहता है। यहां आने वाले सैलानियों का स्वागत पारंपरिक तिलक और आत्मीयता से किया जाता है, जो उत्तराखंड की समृद्ध पहाड़ी संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। तस्वीरों में दिखता यह तिलक-सत्कार केवल परंपरा नहीं, बल्कि “अतिथि देवो भव” की जीवंत अनुभूति है।
पहाड़ों में जहां रोजगार के सीमित अवसरों के कारण पलायन एक बड़ी समस्या बना हुआ है, वहीं शशिभूषण मैठाणी की यह पहल स्थानीय लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है। उन्होंने यह साबित किया है कि यदि इच्छाशक्ति और नवाचार हो, तो अपने गांव में ही स्वरोजगार के नए रास्ते खोले जा सकते हैं।

यह होमस्टे सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, खान-पान और जीवनशैली को करीब से महसूस करने का माध्यम बन चुका है। यहां आने वाले पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ पहाड़ की आत्मा से भी जुड़ते हैं।
मैठाणा का यह मॉडल आज उन तमाम गांवों के लिए संदेश है, जो खाली होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए, तो न केवल रोजगार बढ़ेगा, बल्कि पहाड़ों की पहचान और संस्कृति भी सुरक्षित रह सकेगी।

